सत्यानुसरण 14
आगे बढ़ो, किंतु माप कर देखने न जाओ कि कितनी दूर बढ़े हो; ऐसा करने से पुनः पीछे रह जाओगे।
अनुभव करो, किंतु अभिभूत मत हो पडो, अन्यथा चल नहीं पाओगे। यदि अभिभूत होना है तो इश्वरप्रेम में होओ।
यथाशक्ति सेवा करो, किंतु सावधान, सेवा लेने की जिसमें इच्छा न जगे।
अनुरोध करो, किंतु हुक्म देने मत जाओ।
कभी भी निंदा न करो, किंतु असत्य को प्रश्रय मत दो।
धीर बनो, किंतु आलसी, दीर्घसूत्री मत बनो।
क्षिप्र बनो, किंतु अधीर होकर विरक्ति को बुलाकर सब कुछ नष्ट मत कर दो।
वीर बनो, किंतु हिंसक होकर बाघ-भालू जैसा न बन जाओ।
स्थिरप्रतिज्ञ होओ, जिद्दी मत बनो।
तुम स्वयं सहन करो, किंतु जो नहीं कर सकता है उसकी सहायता करो, घृणा मत करो, सहानुभूति दिखलाओ, साहस दो।
स्वयं अपनी प्रशंसा करने में कृपण बनो, किंतु दूसरे के समय दाता बनो।
जिस पर क्रुद्ध हुए हो, पहले उसे आलिंगन करो, अपने घर पर भोजन के लिए निमंत्रण दो, डाली भेजो एवं हृदय खोलकर जब तक बातचीत नहीं करते तब तक अनुताप सहित उसके मंगल के लिए परमपिता से प्रार्थना करो; क्योंकि विद्वेष आते ही क्रमश: तुम संकीर्ण हो जाओगे और संकीर्णता ही पाप है।
यदि कोई तुम पर कभी भी अन्याय करे, और नितांत ही उसका प्रतिशोध लेना हो तो तुम उसके साथ ऐसा व्यवहार करो जिससे वह अनुपप्त हो; ऐसा प्रतिशोध और नहीं है- अनुताप है तुषानल। उसमें दोनों का मंगल है।
बंधुत्व खारिज न करो अन्यथा सजा में संवेदना एवं सांत्वना नहीं पाओगे।
तुम्हारा बन्धु अगर असत भी हो, उसे न त्यागो वरन प्रयोजन होने पर उसका संग बंद करो, किंतु अन्तर में श्रद्धा रखकर विपत्ति-आपत्ति में कायमनोवाक्य से सहायता करो और अनुतप्त होने पर आलिंगन करो।
तुम्हारा बन्धु अगर कुपथ पर जाता है और तुम यदि उसे लौटाने की चेष्टा न करो या त्याग करो तो उसकी सजा तुम्हें भी नहीं छोड़ेगी।
बन्धु की कुत्सा न रटो या किसी भी तरह दूसरे के निकट निंदा न करो; किंतु उसका अर्थ यह नहीं कि उसके निकट उसकी किसी बुराई को प्रश्रय दो।
बन्धु के निकट उद्धत न होओ किंतु प्रेम के साथ अभिमान से उस पर शासन करो।
बन्धु से कुछ प्रत्याशा न रखो किंतु जो पाओ प्रेम सहित ग्रहण करो। कुछ दो तो पाने की आशा न रखो, किंतु कुछ पाने पर देने की चेष्टा करो।
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सारांश: ठाकुर
श्री अनुकूलचंद्र जी की वाणी (सत्यानुसरण 14)
ठाकुर श्री
अनुकूलचंद्र जी की उपरोक्त वाणी जीवन के विभिन्न पहलुओं की गहन समझ और संतुलन को
दर्शाती है। उनके अनुसार, व्यक्ति को अपने कर्मों, अनुभवों, सेवाओं, और संबंधों में सही दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। आइए
इस उपदेश को विस्तार से समझें:
1. कर्म का मापन: ठाकुर जी ने कहा है कि हमें अपने कर्मों की
प्रगति को बार-बार मापने की आदत से बचना चाहिए। अगर हम निरंतर मापते रहेंगे कि
कितनी दूर बढ़े हैं, तो यह हमें असंतुष्ट कर सकता है और हमारी प्रगति को धीमा कर
सकता है। हमें कर्म को स्वाभाविक रूप से करते रहना चाहिए और परिणाम की चिंता किए
बिना आगे बढ़ना चाहिए।
2. अनुभव और अभिभूतता: अनुभव महत्वपूर्ण है, लेकिन ठाकुर जी का कहना है कि हमें अनुभव से
अभिभूत नहीं होना चाहिए। यदि हम किसी अनुभव से इतने प्रभावित हो जाते हैं कि वह
हमें आगे बढ़ने से रोकता है, तो यह हमारे विकास में बाधक हो सकता है। ईश्वरप्रेम में
अभिभूत होना उचित है, क्योंकि यह हमारी आत्मिक उन्नति का मार्ग खोलता है।
3. सेवा और स्वार्थ: सेवा को निस्वार्थ भाव से करना चाहिए। ठाकुर जी
ने यह चेतावनी दी है कि सेवा करते समय हमें लेने की इच्छा नहीं रखनी चाहिए।
निस्वार्थ सेवा ही सच्चे अर्थों में फलदायक होती है।
4. अनुरोध और हुक्म: अनुरोध करते समय विनम्रता बनाए रखना आवश्यक है।
ठाकुर जी ने कहा है कि हमें कभी भी हुक्म देने की प्रवृत्ति नहीं रखनी चाहिए, क्योंकि इससे हमारे सम्मान को खतरा हो सकता है
और संबंधों में खटास आ सकती है।
5. सत्य और निंदा: ठाकुर जी ने हमें सिखाया है कि निंदा नहीं करनी
चाहिए, लेकिन असत्य को
प्रश्रय भी नहीं देना चाहिए। सत्य के प्रति निष्ठावान रहना चाहिए, लेकिन विनम्रता और सहानुभूति के साथ।
6. धैर्य और गति: धैर्य का मतलब आलस्य या दीर्घसूत्री होना नहीं
है। हमें सतर्क और सक्रिय रहना चाहिए, और तेज गति से काम करते समय भी अधीरता से बचना
चाहिए। गति और धैर्य का संतुलन ही सफलता का मार्ग है।
7. वीरता और अहिंसा: वीरता को साहस और सहानुभूति के साथ जोड़ना
चाहिए। वीरता का मतलब हिंसा नहीं है। यदि हम वीरता को हिंसा के साथ जोड़ते हैं, तो हम केवल शक्ति का प्रदर्शन करते हैं, जो उचित नहीं है।
8. स्थिरता और लचीलापन: स्थिरता का अर्थ है अपने संकल्पों में निरंतरता
बनाए रखना, लेकिन जिद्दी नहीं बनना चाहिए। जिद से विचार संकीर्ण हो सकते हैं। स्थिरता और
लचीलापन का संतुलन आवश्यक है।
9. सहनशीलता और सहायता: सहनशीलता के साथ-साथ हमें दूसरों की सहायता भी
करनी चाहिए। सहनशीलता का मतलब दूसरों के कष्टों को नजरअंदाज करना नहीं है। हमें
सहानुभूति दिखानी चाहिए और सहायता करनी चाहिए।
10.
प्रशंसा: अपनी प्रशंसा में कृपण रहना चाहिए, लेकिन दूसरों की प्रशंसा में उदार होना चाहिए।
इससे समाजिक संबंध मजबूत होते हैं और आपसी सम्मान बढ़ता है।
11.
विद्वेष और क्षमा: क्रोध होने पर, हमें पहले उस व्यक्ति को आलिंगन करना चाहिए और
उसकी मंगलकामना के लिए प्रार्थना करनी चाहिए। विद्वेष संकीर्णता को जन्म देता है, जो पाप है। प्रतिशोध का सबसे अच्छा तरीका है
अच्छा व्यवहार करना और अनुताप दिखाना।
12.
बंधुत्व और निष्ठा: बंधुत्व को कभी भी खारिज नहीं करना चाहिए। अगर
बंधु असत हो जाए, तो उसे त्यागने के बजाय सही मार्ग पर लाने का प्रयास करना
चाहिए। बंधुत्व निभाने के लिए निष्ठा और समर्पण बनाए रखना चाहिए।
प्रश्नावली और
उत्तर
1. प्रश्न: ठाकुर जी के अनुसार, कर्म करते समय हमें क्या करना चाहिए?
उत्तर: हमें कर्म करते समय उसके परिणाम की चिंता किए बिना उसे पूरी
लगन और समर्पण के साथ करना चाहिए।
2. प्रश्न: अनुभव से अभिभूत होने के क्या परिणाम हो सकते
हैं?
उत्तर: यदि हम अनुभव से अभिभूत हो जाते हैं, तो यह हमें आगे बढ़ने से रोक सकता है और हमारे
विकास में बाधक हो सकता है।
3. प्रश्न: ठाकुर जी के अनुसार सेवा करने का सही तरीका क्या
है?
उत्तर: सेवा को निस्वार्थ भाव से करना चाहिए और सेवा लेते समय लेने
की इच्छा नहीं जगे।
4. प्रश्न: अनुरोध करते समय हमें क्या ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर: अनुरोध करते समय विनम्रता बनाए रखना चाहिए और हुक्म देने की
प्रवृत्ति से बचना चाहिए।
5. प्रश्न: सत्य और निंदा के बारे में ठाकुर जी की क्या
सलाह है?
उत्तर: हमें निंदा नहीं करनी चाहिए, लेकिन असत्य को प्रश्रय भी नहीं देना चाहिए।
सत्य के प्रति निष्ठावान रहना चाहिए।
6. प्रश्न: धैर्य और गति के संतुलन का महत्व क्या है?
उत्तर: धैर्य और गति का संतुलन आवश्यक है। धैर्य का मतलब आलस्य
नहीं है और गति के साथ अधीरता से बचना चाहिए।
7. प्रश्न: वीरता का सही स्वरूप क्या होना चाहिए?
उत्तर: वीरता को साहस और सहानुभूति के साथ जोड़ना चाहिए, हिंसा के साथ नहीं।
8. प्रश्न: स्थिरता और लचीलापन का संतुलन कैसे बनाए रखें?
उत्तर: स्थिरता का अर्थ है निरंतरता बनाए रखना, लेकिन जिद्दी नहीं बनना चाहिए। लचीलापन बनाए
रखना आवश्यक है।
9. प्रश्न: सहनशीलता और सहायता के बीच का संबंध क्या है?
उत्तर: सहनशीलता का मतलब दूसरों के कष्टों को नजरअंदाज करना नहीं
है। हमें सहानुभूति दिखानी चाहिए और सहायता करनी चाहिए।
10.
प्रश्न: अपनी प्रशंसा में कृपण रहने का क्या लाभ है?
उत्तर: अपनी प्रशंसा में कृपण रहने से हम अति-गर्वित नहीं होते, जबकि दूसरों की प्रशंसा में उदार रहने से समाजिक
संबंध मजबूत होते हैं।
11.
प्रश्न: विद्वेष और क्षमा के बीच का संबंध कैसे है?
उत्तर: विद्वेष संकीर्णता को जन्म देता है, जबकि क्षमा और अच्छा व्यवहार करना अनुताप है और
इससे दोनों पक्षों का मंगल होता है।
12.
प्रश्न: बंधुत्व को निभाने के लिए क्या करना चाहिए?
उत्तर: बंधुत्व को निभाने के लिए निष्ठा और समर्पण बनाए रखना चाहिए, और असत बंधु को सही मार्ग पर लाने का प्रयास
करना चाहिए।
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