सत्यानुसरण 55

प्रेम की प्रार्थना करो, और हिंसा को दूर से परिहार करो, जगत् तुम्हारी और आकृष्ट होगा ही।

तुम्हें मन का संन्यास हो; संन्यासी का वेष बनाकर झूठमूठ बहुरूपिया मत बन बैठो।

तुम्हारा मन सत् या ब्रह्म में विचरण करे, किंतु शरीर को गेरूआ या रंग टंग से सजाने में व्यस्त मत होओ, ऐसा करने से मन शरीरमुखी हो जायेगा।

अहंकार त्याग करो, सत् स्वरूप में अवस्थान कर पाओगे।

पतित को उद्धार की बात सुनाओ, आशा दो, छल-बल-कौशल से उसके उन्नयन में सहायता करो, साहस दो-किंतु उच्छृन्खल होने मत दो।

यदि किसी दिन अपने प्रेमास्पद को सर्वस्व न्योच्छावर कर निमज्जित हुए हो--और उतरा आने की आशंका देखते हो, तो जोर करके तत्क्षण निमज्जित होकर विगतप्राण हो जाओ--देखोगे--प्रेमास्पद कितने सुंदर हैं, किस प्रकार तुम्हें आलिंगन किए हुए हैं।

यदि थोडी-सी लोकनिंदा, उपहास, स्वजनानुरक्ति, स्वार्थहानि, अनादर, आत्म या परगंजना तुम्हें अपने प्रेमास्पद से दूर रख सके तो तुम्हारा प्रेम कितना क्षीण है--क्या ऐसी बात नहीं?

किसी चीज को "आज समझ गया हूँ फिर कल समझ में नहीं आती--पहेली" इत्यादि कहकर शृगाल मत बनो--कारण, इतर जंतु भी जिसे समझ लेते हैं उसे भूलते नहीं। इसीलिए, ऐसा बोलना ही दुष्ट या अस्थिर-बुद्धि का परिचायक है।

आज उपकृत हुआ हूँ इसलिए कल फिर स्वार्थान्ध होकर अपकृत होने का बहाना कर अकृतज्ञता को मत बुला लो। इससे बढ़कर इतरता और क्या है? जिस किसी से पूछ लो।

मूर्खता नहीं रहने से उपकृत की कुत्सा से उपकारी को निन्दित नहीं किया जाता।

उपकारी जब उपकृत द्बारा विध्वस्त होता है तब मूढ़ अहं कृतज्ञतारूपी अर्गला को तोड़कर दंभकंटकाकीर्ण मृत्यु-पथ को उन्मुक्त करता है।

आश्रित की निंदा से जो आश्रय को कुत्सित विवेचना करते हैं--विश्वासघातकता उनका पीछा करती है।

प्रिय के प्रति प्रेम या मंगलविहीन कर्म कभी भी प्रेम का परिचायक नहीं।

प्रियतम के लिए कुछ करने की इच्छा नहीं होती--तत्राच खूब प्रेम करता हूँ--यह बात जैसी है, सोने का पीतल से बने पंडूक की बात भी वैसी है। स्वार्थबुद्धि ही प्रायः वैसा प्रेम करती है, इसीलिए--वैसे निष्काम धर्माक्रांत प्रेम को देखकर सावधान होना अच्छा है, नहीं तो विपदा की संभावना ही अधिक है।

प्रेम करते हो--अपिच तुम्हारे ऊपर उसके जोर या आधिपत्य, शासन, अपमान, अभिमान अथवा जिद करने से ही तुम्हें सुख होने के बजाय उल्टा होता है या ख़त्म हो जाता है--मैं कहता हूँ--तुम निश्चय ठगाओगे एवं ठगोगे, जितने दिन इस तरह रहोगे, --इसीलिए अभी भी सावधान होओ।

प्रेम का मोह--बाधा पाते ही वृद्धि, प्रेमास्पद के अत्याचार में भी घृणा नहीं आती, विच्छेद में सतेज होता है, मनुष्य को मूढ़ नहीं बनता, चिर दिन अतृप्ति रहती है, एक बार स्पर्श कर लेने पर त्यागा नहीं जाता--अपरिवर्तनीय हैं।

काम का मोह--बाधा में क्षीण, काम के अत्याचार से या जैसा चाहता है वैसा नहीं पाने पर घृणा, विच्छेद में भूल, मनुष्य को कापुरुष एवं मूढ़ बना देता है, भोग में ही है तृप्ति एवं विषाद, चिर दिन नहीं रहता--परिवर्तनीय है।

गरीयान होओ किंतु गर्वित मत बनो।

यदि मुग्ध करना चाहते हो तो स्वयं सम्पूर्ण भाव से मुग्ध होओ।

यदि सुंदर होने की इच्छा हो तो कुरूप में भी सुंदर देखो।

एकानुरक्ति, तीव्रता एवं क्रमागति में ही जीवन का सौन्दर्य एवं सार्थकता है।

बहुतों के प्रति प्रीति जो एक के प्रति प्रीति को हिला या विच्छिन्न नहीं कर सकती, वही प्रीति है प्रेम की भगिनी।

भले-बुरे का विचार कर विध्वस्त होने के बजाय सत् में (गुरु में) आकृष्ट होओ -- निर्विघ्न रूप से सफल होगे निश्चय।

दुर्बलता के समय सुंदर एवं सबलता की चिंता करो, और अहंकार में प्रिय एवं दीनता की चिंता करो--मानसिक स्वास्थ्य अक्षुन्न रहेगा।

दोष देखकर दुष्ट मत बनो, और तुम में संलग्न सभी को दुष्ट मत बना दो।

उन्हें दो--मांगो नहीं--पाने पर आनादित होओ।

तुम उनके इच्छाधीन होओ, उन्हें अपने इच्छाधीन करने की चेष्टा करो--कारण, तुम्हारे लिए वे ही सुंदर हैं।

मिलन की आकुलता को किसी भी तरह त्यागो, अन्यथा विरह की व्यथा मधुर नहीं होगी--और, दुःख में शान्ति अनुभव नहीं कर पाओगे।

जिसके लिए तुम्हारा सोचना, करना एवं बोध जितना एवं जिस प्रकार है, उसके प्रति तुम्हारी आसक्ति, खिंचाव या प्रेम उतना ही और उसी प्रकार है।

जिनके लिए सर्वस्व न्योच्छावर कर दिए हो-वे ही तुम्हारे भगवान् हैं, और वे ही हैं तुम्हारे परम गुरु।

--ठाकुर अनुकूल चन्द्र 

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ठाकुर जी द्वारा लिखित उपरोक्त पंक्तियाँ प्रेम, अहंकार, संन्यास, और जीवन के उच्चतम आदर्शों के बारे में गहन अंतर्दृष्टि प्रदान करती हैं। इन पंक्तियों का उद्देश्य हमें सच्चे प्रेम, त्याग, और आत्मिक उन्नति के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करना है। ठाकुर जी ने प्रेम की वास्तविक परिभाषा को विस्तार से समझाया है, जिसे केवल भौतिक और आत्मिक दृष्टिकोण से ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक स्तर पर भी समझा जाना चाहिए।

प्रेम की प्रार्थना और हिंसा का परित्याग: 

ठाकुर जी ने प्रेम को सबसे महत्वपूर्ण गुण माना है, जो व्यक्ति को आत्मिक उन्नति की ओर ले जाता है। प्रेम की प्रार्थना से मनुष्य के भीतर की करुणा और सहिष्णुता जाग्रत होती है, जिससे वह अपने आस-पास के जगत को आकर्षित कर सकता है। इसके विपरीत, हिंसा का परित्याग करने से मनुष्य के भीतर की कठोरता और कठोर भावनाओं का नाश होता है, जो उसे सच्चे प्रेम के मार्ग पर आगे बढ़ने में मदद करता है।

मन का संन्यास और वेषधारण का विरोध: 

ठाकुर जी ने संन्यास को केवल वेषधारण तक सीमित नहीं रखा है, बल्कि उसे मानसिक और आत्मिक स्तर पर समझा है। वे कहते हैं कि संन्यासी का वेष धारण करने से व्यक्ति के भीतर का अहंकार बढ़ता है और वह स्वयं को बाहरी आडंबर में उलझा लेता है। इसके बजाय, मन का संन्यास करना आवश्यक है, जिससे व्यक्ति सच्चे अर्थों में संन्यासी बन सकता है। यह संन्यास आत्मा को ब्रह्म से जोड़ता है और व्यक्ति को अहंकार रहित बनाता है।

पतितों का उद्धार और प्रेम का आदान-प्रदान: 

ठाकुर जी ने पतितों के उद्धार की बात पर जोर दिया है। उन्होंने कहा है कि हमें पतितों को आशा और साहस देना चाहिए, जिससे वे अपने जीवन में सुधार ला सकें। यह प्रेम का एक महत्वपूर्ण रूप है, जिसमें हमें दूसरों की मदद करने और उन्हें उन्नति के मार्ग पर ले जाने के लिए तत्पर रहना चाहिए। हालांकि, उन्होंने चेतावनी दी है कि हमें पतितों को उच्छृन्खल नहीं बनने देना चाहिए, क्योंकि यह उनके जीवन में और अधिक कठिनाइयाँ ला सकता है।

प्रेम और मोह का अंतर: 

ठाकुर जी ने प्रेम और मोह के बीच के अंतर को स्पष्ट किया है। उन्होंने बताया है कि सच्चा प्रेम अपरिवर्तनीय होता है, जो कठिनाइयों में भी स्थिर रहता है। सच्चा प्रेम बाधाओं में और अधिक बढ़ता है, और व्यक्ति को आत्मिक उन्नति की ओर ले जाता है। इसके विपरीत, मोह एक अस्थायी भावना है, जो बाधाओं के सामने कमजोर पड़ जाता है और व्यक्ति को भटकने के लिए मजबूर करता है। मोह में तृप्ति केवल भोग में ही होती है, जबकि प्रेम में तृप्ति आत्मिक और मानसिक संतोष में होती है।

कृतज्ञता और अकृतज्ञता: 

ठाकुर जी ने कृतज्ञता को जीवन का एक महत्वपूर्ण गुण बताया है। उन्होंने कहा है कि जो व्यक्ति कृतज्ञता को भूल जाता है, वह जीवन में असफलता और दुख का सामना करता है। कृतज्ञता व्यक्ति को विनम्र और धरातल पर बनाए रखती है, जबकि अकृतज्ञता व्यक्ति को अहंकार और आत्ममुग्धता की ओर धकेलती है। यह जीवन में अस्थिरता और असंतोष का कारण बनती है।

प्रेमास्पद की महिमा और उनके प्रति समर्पण: 

ठाकुर जी ने प्रेमास्पद के प्रति सच्चे प्रेम और समर्पण की महिमा का वर्णन किया है। उन्होंने बताया है कि प्रेमास्पद के प्रति सच्चा प्रेम व्यक्ति को आत्मिक आनंद और शांति प्रदान करता है। सच्चा प्रेम असत्य और स्वार्थ से परे होता है और व्यक्ति को सच्चाई और उदारता की ओर ले जाता है। प्रेमास्पद के प्रति समर्पण व्यक्ति को आत्मिक उन्नति की ओर अग्रसर करता है, जो उसे जीवन के प्रत्येक पहलू में संतुलन और स्थिरता प्रदान करता है।

निष्कर्ष:

ठाकुर जी की ये पंक्तियाँ हमें जीवन के उच्चतम आदर्शों की ओर ले जाने के लिए मार्गदर्शन करती हैं। उन्होंने हमें सिखाया है कि सच्चे प्रेम, त्याग, और संन्यास का महत्व क्या है, और कैसे इन गुणों को आत्मसात करके हम अपने जीवन में आत्मिक उन्नति और संतोष प्राप्त कर सकते हैं। हमें प्रेम की प्रार्थना करनी चाहिए, अहंकार का त्याग करना चाहिए, और सच्चे अर्थों में संन्यासी बनने का प्रयास करना चाहिए। इन गुणों को अपनाने से हम अपने जीवन को सफल और सार्थक बना सकते हैं।


प्रश्नोतरी:

  1. प्रश्न: ठाकुर जी ने प्रेम की प्रार्थना करने का क्या महत्व बताया है?
    • उत्तर: ठाकुर जी ने प्रेम की प्रार्थना करने को महत्वपूर्ण बताया है क्योंकि इससे मनुष्य के भीतर की करुणा और सहिष्णुता जाग्रत होती है, जो उसे आत्मिक उन्नति की ओर ले जाती है।
  2. प्रश्न: संन्यास को केवल वेषधारण से क्यों नहीं जोड़ा गया है?
    • उत्तर: ठाकुर जी ने कहा कि संन्यास को केवल वेषधारण से नहीं जोड़ा गया है क्योंकि यह बाहरी आडंबर के बजाय मानसिक और आत्मिक संन्यास होना चाहिए, जो व्यक्ति को अहंकार से मुक्त करता है।
  3. प्रश्न: सच्चे प्रेम और मोह में क्या अंतर है?
    • उत्तर: सच्चा प्रेम अपरिवर्तनीय होता है और कठिनाइयों में भी स्थिर रहता है, जबकि मोह अस्थायी होता है और बाधाओं के सामने कमजोर पड़ जाता है।
  4. प्रश्न: कृतज्ञता का क्या महत्व है?
    • उत्तर: कृतज्ञता व्यक्ति को विनम्र और धरातल पर बनाए रखती है, जिससे वह जीवन में संतोष और स्थिरता प्राप्त करता है। अकृतज्ञता व्यक्ति को अहंकार और आत्ममुग्धता की ओर धकेलती है।
  5. प्रश्न: प्रेमास्पद के प्रति समर्पण से क्या लाभ होता है?
    • उत्तर: प्रेमास्पद के प्रति समर्पण से व्यक्ति को आत्मिक आनंद और शांति प्राप्त होती है, और यह उसे आत्मिक उन्नति की ओर अग्रसर करता है।

संक्षिप्त अर्थ:

इन प्रश्नों और उत्तरों का उद्देश्य ठाकुर जी के उपदेशों के गहरे अर्थ को समझाना है। प्रेम, संन्यास, कृतज्ञता, और आत्मिक उन्नति के मार्ग पर चलने के लिए ये शिक्षाएँ हमें जीवन में सही दिशा दिखाती हैं।

 

 

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