सत्यानुसरण 5

 यदि साधना में उन्नति लाभ करना चाहते हो तो कपटता त्यागो।

कपट व्यक्ति दूसरे से सुख्याति की आशा में अपने आप से प्रवंचना करता हैअल्प विश्वास के कारण दूसरे के प्रकृत दान से भी प्रवंचित होता है।
तुम लाख गल्प करोकिंतु प्रकृत उन्नति नहीं होने पर तुम प्रकृत आनंद कभी भी लाभ नहीं कर सकते।
कपटाशय के मुख की बात के साथ अन्तर का भाव विकसित नहीं होताइसी से आनंद की बात में भी मुख पर निरसता के चिह्न दृष्ट होते हैंकारणमुँह खोलने से होता ही क्या हैहृदय में भाव की स्फूर्ति नहीं होती।
अमृतमय जल कपटी के लिए तिक्त लवणमय होता हैतट पर जाकर भी उसकी तृष्णा निवारित नहीं होती।
सरल व्यक्ति उर्द्धदृष्टिसंपन्न चातक के समान होता है। कपटी निम्नदृष्टिसंपन्न गृद्ध के समान। छोटा होओकिंतु लक्ष्य उच्च होबड़ा एवं उच्च होकर निम्नदृष्टिसंपन्न गृद्ध के समान होने से लाभ ही क्या है?
कपटी मत बनोअपने को  ठगो और दूसरे को भी  ठगो।

परमप्रिय श्री श्री ठाकुर अनुकूलचंद्र की यह दिव्य वाणी साधना के मार्ग पर चलने वालों के लिए एक अमूल्य मार्गदर्शन है।

ठाकुर जी स्पष्ट करते हैं कि यदि साधक अपने जीवन में सच्ची उन्नति (आत्मिक प्रगति) चाहता है, तो उसे सबसे पहले कपट (छल, दिखावा, दोहरापन) का त्याग करना होगा।

कपट करने वाला व्यक्ति दूसरों से प्रशंसा पाने के लिए अपने ही आत्मा को धोखा देता है। वह बाहर से कुछ और दिखाता है, भीतर कुछ और होता है। इस कारण वह सच्चे विश्वास और प्रेम से भी वंचित रह जाता है।

ठाकुर जी हमें सावधान करते हैं कि—
केवल बातें बनाने से, कथाएँ कहने से या दिखावा करने से सच्चा आनंद कभी प्राप्त नहीं होता
जब तक हृदय में सच्चा भाव नहीं जागता, तब तक मुख की बातें केवल खाली शब्द रह जाती हैं।

कपटयुक्त हृदय में आनंद का अनुभव नहीं होता। इसलिए—even जब वह आनंद की बात करता है—उसके चेहरे पर निरसता और शुष्कता दिखाई देती है।

ठाकुर जी अत्यंत सुंदर उदाहरण देते हैं—

  • कपटी व्यक्ति के लिए अमृत भी कड़वा लगता है
  • वह सत्य के तट पर पहुँचकर भी अपनी प्यास नहीं बुझा पाता

इसके विपरीत—
सरल (निर्मल) व्यक्ति चातक पक्षी की तरह होता है, जिसकी दृष्टि सदैव ऊपर (ईश्वर की ओर) होती है
जबकि कपटी व्यक्ति गिद्ध की तरह होता है, जिसकी दृष्टि नीचे (लोभ और स्वार्थ) में लगी रहती है

ठाकुर जी का अमृत संदेश है—
छोटे बनो, पर लक्ष्य ऊँचा रखो
बड़ा बनकर भी यदि दृष्टि नीची है, तो उसका कोई मूल्य नहीं

अंत में ठाकुर जी हमें प्रेमपूर्वक आदेश देते हैं—
“कपटी मत बनो, अपने को मत ठगो और किसी दूसरे को भी मत ठगो।”


प्रश्नोत्तरी (ठाकुर जी की महिमा केंद्र में रखते हुए)

प्रश्न 1: ठाकुर जी के अनुसार साधना में उन्नति के लिए सबसे आवश्यक क्या है?
उत्तर: ठाकुर जी के अनुसार साधना में उन्नति के लिए कपट (छल-कपट) का त्याग करना अत्यंत आवश्यक है।


प्रश्न 2: कपटी व्यक्ति अपने साथ क्या करता है?
उत्तर: कपटी व्यक्ति दूसरों से प्रशंसा पाने के लिए अपने ही आत्मा को धोखा देता है और स्वयं को प्रवंचित करता है।


प्रश्न 3: क्या केवल बातों और दिखावे से सच्चा आनंद मिल सकता है?
उत्तर: नहीं, ठाकुर जी के अनुसार केवल बातों और दिखावे से सच्चा आनंद नहीं मिलता; इसके लिए हृदय की सच्चाई आवश्यक है।


प्रश्न 4: कपटी व्यक्ति के जीवन में आनंद क्यों नहीं आता?
उत्तर: क्योंकि उसके भीतर सच्चा भाव विकसित नहीं होता, इसलिए उसके शब्दों में भी जीवन नहीं होता और वह आनंद से वंचित रहता है।


प्रश्न 5: ठाकुर जी ने कपटी और सरल व्यक्ति की तुलना किससे की है?
उत्तर: ठाकुर जी ने सरल व्यक्ति की तुलना चातक पक्षी से की है (जिसकी दृष्टि ऊपर होती है) और कपटी व्यक्ति की तुलना गिद्ध से की है (जिसकी दृष्टि नीचे होती है)।


प्रश्न 6: “छोटा होओ, किंतु लक्ष्य उच्च हो” का क्या अर्थ है?
उत्तर: इसका अर्थ है कि व्यक्ति भले ही साधारण हो, लेकिन उसका उद्देश्य और दृष्टि ऊँची (ईश्वर और सत्य की ओर) होनी चाहिए।


प्रश्न 7: ठाकुर जी का अंतिम संदेश क्या है?
उत्तर: ठाकुर जी का अंतिम संदेश है—“कपटी मत बनो, न अपने को ठगो और न ही किसी दूसरे को ठगो।”


निष्कर्ष

हमारे जीवन का सच्चा विकास तभी संभव है, जब हम अपने ठाकुर जी की इस अमृत वाणी को हृदय में उतार लें।उनकी शिक्षा हमें सच्चाई, सरलता और उच्च लक्ष्य की ओर ले जाती है।
उनके चरणों में श्रद्धा रखकर ही हम सच्चे आनंद और उन्नति को प्राप्त कर सकते हैं।


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें