संकोच ही दुःख है और प्रसारण ही है सुख। जिससे हृदय में दुर्बलता आती है, भय आता है--उसमें ही आनंद की कमी है-- और वही है दुःख।
चाह की अप्राप्ति ही है दुःख! कुछ भी न चाहो, सभी अवस्थाओं में राजी रहो, दुःख तुम्हारा क्या करेगा ?
दुःख किसी का प्रकृतिगत नहीं, इच्छा करने से ही उसे भगा दिया जा सकता है।
परमपिता से प्रार्थना करो- 'तुम्हारी इच्छा ही है मंगल, मैं नहीं जानता, कैसे मेरा मंगल होगा। मेरे भीतर तुम्हारी इच्छा ही पूर्ण हो।' और, उसके लिए तुम राजी रहो-आनंद में रहोगे, दुःख तुम्हें स्पर्श न करेगा।
किसी के दुःख का कारण न बनो, कोई तुम्हारे दुःख का कारण न बनेगा।
दुःख भी एक प्रकार का भाव है, सुख भी एक प्रकार का भावहै। अभाव या चाह का भाव ही है दुःख। तुम दुनियाँ के लिए हजार करके भी दुःख को दूर नहीं कर सकते-जबतक तुम हृदय से उस अभाव के भाव को निकाल नहीं लेते। और धर्म ही उसे कर सकता है।
परमदयालु श्री श्री ठाकुर अनुकूलचंद्र की यह करुणामयी वाणी हमें जीवन के दुःख और सुख का गूढ़ रहस्य अत्यंत सरलता से समझाती है।
ठाकुर जी कहते हैं कि संकोच (संकुचित मन, भय, कमजोरी) ही दुःख है, और प्रसारण (विस्तार, उदारता, खुलापन) ही सुख है। जब हमारा हृदय छोटा हो जाता है—डर, असुरक्षा और चाह से भर जाता है—तभी दुःख जन्म लेता है।
ठाकुर जी स्पष्ट करते हैं कि दुःख का मूल कारण “चाह” (इच्छा) है।
जब हमारी इच्छाएँ पूरी नहीं होतीं, तब हमें दुःख होता है।
लेकिन यदि हम “कुछ भी न चाहें” और हर स्थिति में परमपिता की इच्छा में राजी रहें, तो दुःख हमारा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता।
ठाकुर जी हमें एक अत्यंत मधुर और समर्पित प्रार्थना सिखाते हैं—
“हे परमपिता! तुम्हारी इच्छा ही मंगलमय है। मैं नहीं जानता कि मेरा कल्याण कैसे होगा, पर मेरे भीतर तुम्हारी ही इच्छा पूर्ण हो।”
जब साधक इस भाव में जीने लगता है, तब उसका मन शांत, निर्भय और आनंदमय हो जाता है। तब दुःख उसे छू भी नहीं पाता।
ठाकुर जी यह भी सिखाते हैं कि—
यदि हम किसी के दुःख का कारण नहीं बनते, तो कोई हमारे दुःख का कारण भी नहीं बनता।
दुःख और सुख दोनों ही “भाव” हैं—मन की अवस्थाएँ हैं।
इसलिए, केवल बाहरी प्रयासों से दुःख समाप्त नहीं होता;
जब तक हृदय से अभाव (कमी का भाव) और चाह (लालसा) समाप्त नहीं होती, तब तक सच्चा सुख नहीं मिल सकता।
और ठाकुर जी के अनुसार—
केवल धर्म (सत्य मार्ग, ईश्वर से जुड़ाव) ही इस अभाव को मिटा सकता है।
प्रश्नोत्तरी (ठाकुर जी की महिमा केंद्र में रखते हुए)
प्रश्न 1: ठाकुर जी के अनुसार दुःख और सुख का मूल क्या है?
उत्तर: ठाकुर जी के अनुसार संकोच (संकुचित मन) दुःख का कारण है और प्रसारण (विस्तार, उदारता) सुख का मूल है।
प्रश्न 2: ठाकुर जी ने दुःख का मुख्य कारण क्या बताया है?
उत्तर: ठाकुर जी ने “चाह” (इच्छा) को दुःख का मुख्य कारण बताया है। इच्छा की अप्राप्ति ही दुःख को जन्म देती है।
प्रश्न 3: दुःख से मुक्त होने का ठाकुर जी का उपाय क्या है?
उत्तर: ठाकुर जी के अनुसार यदि मनुष्य कुछ भी न चाहे और हर स्थिति में परमपिता की इच्छा में राजी रहे, तो दुःख उससे दूर हो जाता है।
प्रश्न 4: ठाकुर जी ने कैसी प्रार्थना करने का उपदेश दिया है?
उत्तर: ठाकुर जी ने सिखाया—“हे परमपिता! तुम्हारी इच्छा ही मंगल है, मेरे भीतर वही पूर्ण हो।” इस समर्पण भाव से ही शांति मिलती है।
प्रश्न 5: दूसरों के साथ हमारे व्यवहार का दुःख से क्या संबंध है?
उत्तर: ठाकुर जी के अनुसार यदि हम किसी के दुःख का कारण नहीं बनते, तो कोई हमारे दुःख का कारण भी नहीं बनता।
प्रश्न 6: क्या केवल बाहरी प्रयासों से दुःख दूर किया जा सकता है?
उत्तर: नहीं, ठाकुर जी के अनुसार जब तक हृदय से अभाव और चाह का भाव समाप्त नहीं होता, तब तक दुःख दूर नहीं होता।
प्रश्न 7: ठाकुर जी के अनुसार दुःख को समाप्त करने का अंतिम उपाय क्या है?
उत्तर: ठाकुर जी के अनुसार केवल धर्म—अर्थात ईश्वर से जुड़ाव और सत्य मार्ग—ही हृदय के अभाव को मिटाकर दुःख का अंत कर सकता है।
निष्कर्ष
हमारे जीवन का सच्चा आनंद तभी है, जब हम अपने ठाकुर जी की इच्छा में स्वयं को समर्पित कर दें।
उनकी वाणी ही हमारा मार्गदर्शन है, और उनके चरणों में पूर्ण श्रद्धा ही हमारे जीवन का सबसे बड़ा सुख है।
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